ललिता देवी मदिर का इतिहास – History of Lalita Devi Madir in hindi

दोस्तों आप में से कई लोग जानते है की उत्तेर प्रदेश इलाहबाद के प्रयागराज जिले में गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम ही नहीं बल्कि ललिता देवी, अलोपशंकरी और कल्याणी देवी के नाम से शक्तिपीठ का भी प्रमुख केंद्र है। इनमे से आज हम आपको ललिता देवी मंदिर की सम्पूर्ण जानकारी देने वाले है। क्योंकि यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। यदि आप ललिता देवी मदिर की सम्पूर्ण जानकारी जानना चाहते है तो इस आर्टिकल को अंत तक जरुर पढ़े।

ललिता देवी का यह शक्तिपीठ मंदिर भारत में उत्तेर प्रदेश इलाहबाद के प्रयागराज जिले में स्थित है। देवी सती के 51 शक्तिपीठो में से एक माता ललिता देवी का यह प्राचीन मंदिर माता सती के शक्ति रूप को समर्पित है। इस स्थान पर देवी सती के हाथ की उंगलिया गिरी थी। इस मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह में स्थित ललिता देवी, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में विराजमान हैं। इसीलिए इस देवी को त्रिपुर सुन्दरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ की शक्ति रूप को ललिता देवी तथा भैरव को भव कहा गया हैं। ललिता देवी मंदिर के पास में ही ललितेश्वर महादेव का भी मंदिर है।

गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों के संगम तट से लगभग 5 km दूर माँ ललिता देवी का मंदिर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि भक्त ललिता देवी के दर्शन से पहले इस संगम पर स्नान करते है। उसके बाद ही माँ ललिता शक्तिपीठ के दर्शन का विशेष महत्व मन जाता है।

ललिता देवी मंदिर की पौराणिक कथा – Legend of Lalita Devi Temple in hindi

पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सती राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री थी जिनका का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार दक्ष प्रजापति ने अपने निवास स्थान कनखल हरिद्वार में एक भव्य यज्ञ का आयोजन कराया और इस भव्य यज्ञ में दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव को छोड़कर बाकि सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया। जब माता सती को पता चला की मेरे पिता ने इस भव्य यज्ञ मेरे पति को आमंत्रित नहीं किया। अपने पिता द्वारा पति का यह अपमान देख माता सती ने उसी यज्ञ में कूदकर अपने प्राणो की आहुति देदी थी।

यह सुचना सुनकर भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गए अपने अर्ध-देवता वीरभद्र और शिव गणों को कनखल युद्ध करने के लिए भेजा। वीरभद्र ने जाकर उस भव्य यज्ञ को नस्ट कर राजा दक्ष का सिर काट दिया। सभी सभी देवताओं के अनुरोध करने पर पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को दोबारा जीवन दान देकर उस पर बकरे का सिर लगा दिया। यह देख राजा दक्ष को अपनी गलतियों का पश्च्याताप हुआ और भगवान शिव से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। तभी भगवान शिव ने सभी देवी देवताओं के सामने यह घोषणा कि हर साल सावन माह, में कनखल में निवास करूँगा।

भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित होते हुए सती के मृत शरीर उठाकर पुरे ब्रह्माण के चक्कर लगाने लगे। तब पश्चात भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित करा था। जिस कारन से सती के जले हुए शरीर के हिस्से पृत्वी के अलग-अलग स्थानों पर जा गिरे। जहा-जहा पर सती के शरीर के भाग गिरे थे वे सभी स्थान “शक्तिपीठ” बन गए। जहा पर ललिता  देवी का मंदिर है इस स्थान पर माता सती की हाथ की उंगलिया गिरी थी। इसीलिए इस मंदिर की गणना 51 शक्तिपीठो में की जाती है। भक्त यहां पर आकर माँ ललिता देवी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते है।

दोस्तों हम उम्मीद करते है कि आपको “ललिता देवी मंदिर” के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा।

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अगर आप कनखल हरिद्वार में स्थित देवी सती के पिता राजा दक्षेस्वर महादेव मंदिर के बारे में पूरी जानकारी चाहते है तो नीचे दिए गए Link पर Click करे।

1. दक्षेस्वर महादेव मंदिर – Dakseswar Mahadev Templ

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