हिन्दू धर्म ग्रंथ के अनुसार अपने माता पिता से अत्यधिक प्रेम और सेवा करने वाले श्रवण कुमार को रामायण में एक उल्लेखित पात्र माना गया है।

अयोध्या के राजा दशरथ जंगल में शिकार करने के लिए गए थे और भूलवश उनके तीर से श्रवण कुमार का वध हो गया था जिस कारण श्रवण के माता पिता ने राजा दशरथ को पुत्र वियोग का श्राप दिया था |और इसी कारन राम को 14 साल का वनवास हुआ था | राजा दशरथ ने प्रिये पुत्र राम को याद करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे जिस कारन श्रवण कुमार रामायण के एक पात्र का नाम है।


आइये अब श्रवण कुमार की पूरी कहानी को विस्तार से जानते है

पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता से बहुत अत्यधिक प्रेम और श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा करते थे। एक बार श्रवण कुमार के माता-पिता ने बोला की पुत्र अब हम बहुत भूढ़े हो गए है हमारी अब तीर्थयात्रा करने की इच्छा है। श्रवण कुमार ने अपने हाथो से एक कांवर बनाई और अपने माता पिता को कांवर में बैठाकर कंधे पर उठाए हुए तीर्थयात्रा करने लगे। यात्रा करते हुए एक दिन वे अयोध्या के पास एक जंगल में पहुंचे। रात में वहां पर श्रवण के माता-पिता को बहुत प्यास लगी। श्रवण कुमार अपना तुंबा लेकर पानी के लिए एक सरयू तट पर गए। और उसी समय वहा पर अयोध्या के राजा दशरथ भी शिकार करने के लिए आए हुए थे। जब श्रवण ने पानी में अपना तुंबा डुबोया तो राजा दशरथ ने समझा की कोई हिरन जल पी रहा है। उन्होंने तभी अपने धनुष से एक शब्दभेदी बाण छोड़ दिया। जो सीधे श्रवण कुमार की छाती में जाकर लगा। जब राजा दशरत को भये हुआ की बाण किसी प्राणी को लगा है वो दुखी होते हुए वहा पर पहुंचे | राजा दशरथ को दुखी देख श्रवण कुमार ने मरते हुए राजा से कहा की मुझे मेरी मृत्यु का दु:ख नहीं है किंतु मुझे मेरे अंधे माता-पिता के लिए बहुत दु:ख है। आप मेरी मृत्यु का समाचार उन्हें जाकर सुना देना | और जल पिलाकर उनकी प्यास को शांत करा देना | तभी दशरथ ने देखा कि श्रवण की आत्मा एक दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग की तरफ जा रही हैं। जैसे ही राजा दशरत ने श्रवण की मृत्यु की खबर उसके माता पिता को दी और बताया की तुम्हारे पुत्र की हत्या मेरे हाथो से हुई है तभी श्रवण कुमार के माता पिता ने राजा दशरत को श्राप देते हुए कहा की तुमने हमसे हमारे पुत्र को छीना है तुम्हे भी अपने पुत्र से दूर रहना पड़ेगा | अपने पुत्र का अग्नि संस्कार कर माता-पिता ने भी उसी चिता में अग्नि समाधि लेली थी | इसीलिए राजा दशरथ को भी अपने प्रिये पुत्र का वियोग सहना पड़ा और रामचंद्र 14 साल के लिए वनवास को चले गए। जिस कारन राजा दशरथ यह वियोग सहन नहीं कर पाए। और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

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