जानिए हरिद्वार का इतिहास

हरिद्वार
हरिद्वार, उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर है और यह एक  हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल  है। यह नगर निगम बोर्ड से नियंत्रित है। यह बहुत प्राचीन नगरी है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक पवित्र स्थल है। अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री) से 353 km की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को ‘गंगाद्वार’ के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ “हरि (ईश्वर) का द्वार” होता है।

 हिंदू धार्मिक के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें  घड़े से गिर गयीं थी जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। कुम्भ या महाकुम्भ से सम्बद्ध कथा का उल्लेख किसी पुराण में नहीं है। विशेष रूप में ही इसका उल्लेख होता रहा है। मान्यता है कि ऐसे चार स्थान है जहा पर अमृत की बुँदे गिरी थी 1.उज्जैन, 2.हरिद्वार, 3.नासिक 4.प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर 12वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है। इस प्रकार बारहवें वर्ष में एक चक्र पूरा होकर फिर पहले स्थान पर महाकुम्भ का समय आ जाता है। पूरी दुनिया से करोड़ों तीर्थयात्री, भक्तजन और पर्यटक यहां इस समारोह को मनाने के लिए हरिद्वार आते  है  हैं और गंगा नदी के तट पर पूर्ण  विधि से स्नान इत्यादि करते हैं।

एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है। ‘हर की पौड़ी’ हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है।

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आज, यह अपने धार्मिक महत्त्व के अतिरिक्त और, राज्य के एक प्रमुख औद्योगिक केन्द्र के रूप में, तेज़ी से विकसित हो रहा है। और यहा पर औद्योगिक विकास निगम, SIDCUL (सिडकुल), BHEL (भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड) और इसके सम्बंधित सहायक इस नगर के विकास के साक्ष्य हैं।