Banganga Vaishno Devi History in Hindi:- माता वैष्णो देवी की तीर्थ यात्रा में सबसे पहले पड़ाव में बाणगंगा ही आती है जिसे बालगंगा के नाम से भी जाना जाता है। यात्रा पर जाने वाले अधितकर सभी श्रद्धालु इस गंगा में स्नान करते है, जिससे उनकी सारी थकावट दूर हो जाती है, और उनका तन मन एकदम पवित्र हो जाता है, उसके बाद ही श्रद्धालु अपनी यात्रा को शुरू करते है।
दोस्तों आज के इस लेख में हम आपको माता वैष्णो देवी की यात्रा के पहले पड़ाव यानी बाणगंगा की सम्पूर्ण जानकारी देने वाले है की आखिर में कब क्यों और कैसे इस गंगा का नाम बाणगंगा पड़ा, और क्या रहस्य है इस कहानी के पीछे, आपसे निवेदन है की पूरी जानकारी जानने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़े।
Banganga Vaishno Devi History in Hindi

Banganga Mata Vaishno Devi Yatra in Hindi (बाणगंगा माता वैष्णो देवी यात्रा)-

इस पवित्र नदी का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है पहला बाण और दूसरा गंगा इन से मिलकर बनी है बाणगंगा जहा पर सभी श्रद्धालु अपनी आस्था की डुबकी लगाते है माता के भवानी द्वार जिसे चेक पोस्ट भी कहते है वहा से लगभग 2 km चलने के बाद आती है बाणगंगा, यहा पर यात्रियों के स्नान करने के लिए दो घाट बने हुए है पहले घाट पर यात्रियों की सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। कियोकि दूसरा घाट थोड़ा आगे चलकर आता है और पहले वाले घाट की तुलना में दूसरा घाट काफी बड़ा और खुला भी है। जिन यात्रियों का हिन्दु धार्मिक परंपरा की तरफ अधिक झुकाव होता है, वो इस पवित्र नदी में स्नान जरूर करते है, कियोंकि आज कल बदलते समय के अनुसार कुछ श्रद्धालु ऐसे भी है जो यहां पर स्नान करने के बजाये सीधा यात्रा पर निकल जाते है। बाणगंगा में एक मार्किट भी है जहा पर यात्रियों के खाने पिने, प्रशाद, बॉडी मसाज, फोटग्राफी और शॉपिंग करने से लेकर सभी तरह की दुकाने देखने को मिलेगी।
Banganga Vaishno Devi History in Hindi

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Mata Vaishno Devi Banganga Story in Hindi (माता वैष्णो देवी बाणगंगा की पौराणिक कथा)-

हिन्दू पुराणों में वैसे तो माता वैष्णो देवी की काफी कथाये देखने को मिलेगी लेकिन उनमे से एक कथा बहुत प्रचलित है। कटरा से कुछ ही दुरी पर स्थित हंसाली गांव में एक श्रीधर नाम का पंडित रहता था। जो माता वैष्णो देवी का बहुत बड़ा भक्त था। लेकिन निसंतान होने के कारन वह बहुत दुखी रहता था। एक बार की बात है जब नवरात्री पूजन के लिए पंडित श्रीधर ने अपने घर 9 कन्याओं को जीमने के लिए बुलाया, उनमे से एक माँ वैष्णवी भी थी सभी कन्याये जीमने के बाद अपने घर वापस चली गयी। लेकिन कन्या के रूप में माँ वैष्णवी वही पर रुक गयी। और पंडित श्रीधर से बोली की सभी गांव वालो को भंडारे का निमंत्रण देकर आ जायो।

पंडित श्रीधर उस कन्या की बात को मानते हुए सभी गांव वालो को अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आता है, वापस लोटते वक्त श्रीधर ने भैरव नाथ और उसके शिष्यों को भी भंडारे के निमंत्रण दे दिया, कुछ ही दिन बाद भंडारे का समय नजदीक आ गया लेकिन गरीब होने के कारन पंडित श्रीधर भंडारे के सामान नहीं जुटा सका, सभी गांव वाले और भैरवनाथ पंडित श्रीधर के घर पहुंच गए। पंडित श्रीधर माँ वैष्णवी की पूजा अर्चना में नील था और अपनी लाज की प्राथना कर रहा था। तभी माँ वैष्णवी एक कन्या के रूप में वहा आती है, और सभी गांव वालो को भोजन कराती है।

जैसे ही वो कन्या भैरवनाथ के पास पहुंच थी है, तो भैरवनाथ उस कन्या से खीर पूड़ी की जगह मॉस मदिरा की मांग करता है। कन्या भैरव से कहती है की ये एक भ्रह्माण का घर है यहां पर खाने के लिए शुद शाकाहारी ही भोजन मिलेगा। लेकिन भैरवनाथ अपनी जींद पर अटल रहा, जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा तब माँ वैष्णवी ने उसके कपट को जान लिया। और वहा से वायु रूप में बदलकर त्रिकुटा पर्वत की और चल उड़ती है। भैरवनाथ भी कन्या का पीछा करते हुए चला गया।

माता की रक्षा के लिए तभी पवन पुत्र हनुमान वहा पर आ पहुंचे पहाड़ियों पर पैदल चलकर हनुमान जी को बहुत प्यास लगी, और उंन्होने माता से आग्रह किया की माँ मुझे बहुत प्यास लगी है कृपया कर जल का कुछ प्रभंद कीजिये। माता वैष्णवी ने हनुमान जी से कहा की, हे हनुमान यहां आस पास कही जल मिल ही जायेगा। तुम जाकर जल पीकर आ जायो में तुम्हारी यही पर प्रतीक्षा करुँगी। परन्तु हनुमान जी काफी हट करने लगे की माता मुझे तो सिर्फ गंगा का ही जल पीना है। उसी जल से मेरी प्यास शांत होगी, तब जाकर माता वैष्णो देवी ने हनुमान जी के आग्रह करने पर अपने धनुस से एक बाण चलाया।

जिस जगह पर माता वैष्णो देवी का बाण लगा था उसी जगह से गंगा जी की पवित्र धारा भहने लगी। तब जाकर हनुमान जी ने अपनी प्यास को शांत किया। उसके बाद गंगा माँ ने वैष्णो देवी को दर्शन दिए और माता वैष्णो देवी से कहा की आपने मुझे यहां अवतरित करके मुझपे आभार प्रकट किया, इसी के साथ आप मुझे स्पर्श करके धन्य भी कीजिये। उसके बाद माता वैष्णो देवी ने गंगा इस उस पवित्र धारा में अपने केश यानी अपने बाल दिए थे। इसलिए इस जगह को बालगंगा भी बोला जाता है। इस गंगा को माता ने अपने धनुष के एक बाण से प्रकट किया था जिस वजह से इसे बाणगंगा कहते है।
Banganga Vaishno Devi History in Hindi

वैसे तो आप जानते ही है की माँ वैष्णो देवी का मंदिर पूरे साल ही खुला रहता है,लेकिन कोरोना के चलते इस यात्रा में काफी नियम भी बनाये गए है इस मंदिर में जो यात्रा करने का सबसे अच्छा समय है वो मार्च और अक्टूबर के बीच का है। नवरात्रो के दिन तो यहां पर बहुत ज्यादा भीड़ देखने को मिलेगी। आप चाहे तो जुलाई माह में भी इस यात्रा को पूरा कर सकते है।

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दोस्तों हम उम्मीद करते है की आपको Banganga Vaishno Devi History in Hindi की सम्पूर्ण जानकारी जानकर अच्छा लगा होगा।

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आप Banganga Vaishno Devi History in Hindi की वीडियो भी देख सकते है जिसमे हमने पूरी यात्रा को विस्तार से समझाया है।

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