श्री माता वैष्णो देवी के मंदिर से जुडी कई किंवदंतियों में से एक किंवदंती जो सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध मानी जाती है। वो पंडित श्रीधर ब्राह्मण की है जिनकी धर्म पत्नी का नाम सुलोचना देवी था वह जम्मू राज्य के कटरा शहर के निकट एक त्रिकूट पर्वत की तलहटी में स्थित हंसाली गाँव में रहते थे। पंडित श्रीधर श्री माता वैष्णो देवी के परम भक्त थे भले ही वह बहुत गरीब थे लेकिन माता वैष्णवी की भक्ति में हमेशा नील रहते थे उनके अपनी कोई संतान नहीं थी एक दिन पंडित श्रीधर के सपने में माता वैष्णवी कन्यारूप में प्रकट हुई और उनसे बोली की वह अपने घर एक भव्य भंडारे का आयोजन करे और उसमे सभी गांव वालो को न्योता दे। उन्होंने अपने स्वप्न की बात अपनी धर्म पत्नी सुलोचना को बताई उसके बाद माता वैष्णवी की ऐसी प्रेरणा और आश्वासन से पंडित श्रीधर ने एक भव्य भंडारे का आयोजन किया।

Pandit Shridhar History In Hindi | पंडित श्रीधर की कहानी

भंडरा करने के लिए पंडित श्रीधर ने एक शुभ तिथि चुनी और अपने आसपास के गांवों में रहने वाले सभी लोगों को भंडारे में भोजन करने के लिए आमंत्रित किया। गरीबी ज्यादा होने के कारन पंडित श्रीधर ने अपने पड़ोसियों और परिचितों के घर-घर जाकर उन्हें कच्चा भोजन देने को कहा जिसे भंडारे के दिन पकाया जा सके और सभी मेहमानों को परोसा जा सके। हालाँकि उनमें से कुछ ही लोगो ने पंडित श्रीधर को कच्चा भोजन दिया बाकि अन्य कई लोगो ने उनको कच्चा भोजन देने से मना कर दिया। और पंडित श्रीधर को आयोजन के साधन के बिना भंडारा आयोजित करने का दुस्साहस करने के लिए उन पर ताना मारने लगे। जैसे-जैसे भंडारे का दिन नजदीक आता गया, ऐसे-ऐसे पंडित श्रीधर की की चिंता भी बढ़ने लगी।

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भंडारे से एक दिन पहले पंडित श्रीधर को पूरी रात नींद नहीं आई। बल्कि वह पूरी रात इस समस्या से जूझते रहे की भंडारे में अपने मेहमानों को कैसे ठहराया जायेगा और कैसे भोजन खिलाया जाएगा क्योंकि उनके पास न तो अपने मेहमानो को ठहराने की ववस्था थी और न ही भोजन की ववस्था थी। जब पंडित श्रीधर सुबह तक अपनी समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकाल सका, तो उसने खुद को अपने भाग्य के हवाले कर दिया और माँ वैष्णवी की पूजा अर्चना में नील हो गया।

दोपहर होते-होते पंडित श्रीधर के यहा मेहमान आने लगे। और जहा-जहा जैसे उन्हें जगह मिली वह सभी अपना स्थान ग्रहण करने लगे। चौकाने वाली बात तो यह थी की पंडित श्रीधर की एक छोटी सी कुटिया में सभी के सभी मेहमान आराम से जगह बनाने में सक्षम थे उसके बाद भी काफी जगह खाली थी। जब पंडित श्रीधर की पूजा समाप्त हुई तो उन्होंने देखा की इतनी बड़ी संख्या में मेहमान आए हुए थे। वह यही सोच रहा था कि अपने मेहमानों को कैसे बताए कि वह उन्हें भंडारे में खाना नहीं खिला पाएगा, तभी उसने माता वैष्णवी को एक छोटी कन्या के रूप में अपनी झोपड़ी से बाहर आते हुए देखा। और झोपडी के अंदर हर तरह के भोजन बने हुए तैयार थे माता वैष्णवी की कृपा से, सभी मेहमानों को उनकी पसंद का भोजन खिलाया गया और गुरु गोरखनाथ के शिष्य भैरों नाथ द्वारा उठाई गई कुछ समस्याओं के बावजूद भी भंडारा बहुत सफल रहा।


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